हरिद्वार। आज से शारदीय नवरात्र की शुरुआत हो गई है। धर्मनगरी हरिद्वार के प्राचीन मायादेवी मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। मां के दर्शन और पूजा अर्चना के लिए स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ ही दूसरे राज्यों से आने वाले भक्त भी पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि मायादेवी मंदिर माता सती के 52 शक्तिपीठों में शामिल है। पौराणिक महत्व के कारण यह मंदिर हरिद्वार के प्रमुख धार्मिक स्थलों में अपनी अलग पहचान रखता है। यहां पूजा अर्चना करने से भक्तों की सभी मुराद पूर्ण होती हैं।नवरात्र को लेकर मंदिर को रंग बिरंगी लाइटों और फूल मालाओं से सजाया गया है।
मायादेवी मंदिर का इतिहास 11वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा मंदिर का संचालन करता है। मंदिर में मां मायादेवी की पूजा की जाती है, जिन्हें हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी भी माना जाता है। प्राचीन समय में हरिद्वार को मायापुरी के नाम से जाना जाता था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां मायादेवी के नाम से इस क्षेत्र की पहचान जुड़ी हुई है। गंगा स्नान के लिए हरिद्वार आने वाले श्रद्धालु मां के दरबार में भी शीश नवाते हैं।
राजा दक्ष और माता सती से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
मायादेवी मंदिर की धार्मिक मान्यता माता सती और भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक कथा से संबंधित है। मंदिर के मुख्य पुजारी भास्कर पुरी महाराज के अनुसार, प्राचीन समय में राजा दक्ष ने हरिद्वार के ही कनखल यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। पिता के यज्ञ में पहुंचीं माता सती अपने पति का अपमान सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने यज्ञ में अपने प्राण त्याग दिए। माता सती के वियोग में भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर विचरण करने लगे। ऐसी मान्यता है कि सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को खंडित किया। जिन स्थानों पर उनके अंग गिरे, उन्हें शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाने लगा। मायादेवी मंदिर को भी इसी पौराणिक परंपरा से जुड़ा शक्तिपीठ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती की नाभि गिरी थी। मंदिर के मुख्य पुजारी भास्कर पुरी महाराज ने बताया कि माता सती का नाम माता उमा था। बाद में उनका नाम सती हो गया। यहां माता सती ने योगबल पर अपना शरीर छोड़ा था। माता सती का प्रथम अंग जिसे नाभि कहा जाता है, यहां स्थापित है। इसलिए यहां माता का दर्शन करने से 52 शक्तिपीठों के फल की प्राप्ति होती है। आज नवरात्रि के दिन देश के अलग-अलग जगह से लोग माता की पूजा अर्चना और दर्शन करने पहुंच रहे हैं। यहां पर जो कोई भी श्रद्धालु सच्चे मन से मन्नत मांगता है, महामाया देवी उसे जरूर पूरा करती हैं।
क्या बोले श्रद्धालु
शारदीय नवरात्र में मां के दर्शन, पूजन और आरती के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहता है। भक्त मां को पुष्प, नारियल और प्रसाद अर्पित कर परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते हैं। वैसे तो साल भर मंदिर में भक्तों का ताता लगा रहता है लेकिन नवरात्रि के दिनों में यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।
पंजाब शहर श्रद्धालु विक्रम कपूर ने बताया कि वह जब भी हरिद्वार आते हैं मां माया देवी के दर्शन करना नहीं भूलते। 52 शक्तिपीठों में से एक माया देवी मंदिर में माता सती की नाभि गिरी थी। यह बहुत प्रसिद्ध मंदिर है और हमेश उन पर मां मायादेवी की कृपा बनी रहती है, मां उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती है।
श्रद्धालु अलका ने बताया कि मायादेवी मंदिर प्रथम शक्तिपीठ है। रोजाना यहां दूर-दूर से भक्त लोग आते हैं। हम भी रोजाना मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं और माता माया देवी ने हमारे सभी मुराद पूरी की हैं। वैसे मंदिर में 12 महीना तक भक्तों की भीड़ रहती है लेकिन नवरात्र में यह संख्या बढ़ जाती है और लोग श्रद्धा भाव से माता की पूजा अर्चना करते हैं।
दीपक शर्मा ने बताया कि माया देवी मंदिर एक प्रसिद्ध सिद्ध पीठ है। पंचपुरी हरिद्वार में सबसे पहले इसी मंदिर की स्थापना हुई थी। यहां पर पूजा अर्चना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। वह कई सालों से मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं और माता ने उन्हें बहुत कुछ दिया हुआ है।
गौरतलब है कि गंगा स्नान और अन्य तीर्थस्थलों के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु मायादेवी मंदिर पहुंचकर पूजा अर्चना करते हैं। प्राचीन धार्मिक परंपराओं और शक्तिपीठ की मान्यता के चलते मां मायादेवी का दरबार श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यह मंदिर हरिद्वार रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड से 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जूना अखाड़े के परिसर में मंदिर का संचालन जूना अखाड़े के साधु संत ही करते हैं। रोजाना सुबह शाम यहां मां की आरती होती है और नवरात्र के दिनों में रोजाना अलग अलग श्रृंगार किए जाएंगे।

